अगर आपके सम्बन्ध बहुत सारे लोगों से है और आप खुद एक समझदार इंसान हैं तो यकीन मानिये आप खुश नहीं रह सकते । पहली स्थिति में होने का मतलब है कि या तो आप चापलूस है या फिर वैसे जो रिश्ता बनाना चाहते हैं और जानते भी हैं । चापलूसों पर मैं बात नहीं करना चाहता, उसके अपने वयक्तिगत कारण हैं, क्यूंकि फिर मुझे गुस्सा आ जाता है, मुझे खाना अच्छा नहीं लगता कुछ दिनों तक । क्या करें, जाति ही इतनी निकृष्ट है इनकी । लेकिन अगर आप दूसरे वाले हैं, यानी कि रिश्तों को अहमियत देने वाले तो आपकी बात अलग है । असलियत में आप सुलह करने के लिए तैयार रहने वाले लोग हैं क्यूंकि आपको पता है कि अपनी अकड़ हम खुद को तो दिखा नहीं सकते, दूसरा आदमी देखने के लिए तैयार नहीं हैं और तीसरी बात कि कोई फायदा भी तो नहीं है अकड़ के इस खेल में । यह तो मूर्खों का हथियार है जिनके पास तर्क नहीं होता उनके पास अकड़ होता है या अकड़ रखते हैं । कुछ तो रखना पड़ेगा न उनको भी, नहीं तो हलके नहीं लगेंगें ? जो सुलहवादी लोग होते हैं वो सोचते हैं कि – बेहतर है कि बात मान के ही बात को मनवाया जाये, दूसरे पक्ष से भी । मेरी नजर में यह एक समझदारी वाला काम है । लेकिन इसमें निचे गिरने का खतरा भी है, बहुत निचे न गिरे, मतलब बहुत न झुकें । कहने का अर्थ यह है कि गरिमा बची रहे । घमंड टूट जाये अच्छा है, लेकिन गौरव नहीं टूटना चाहिए । एक बार गौरव टूट गया तो फिर बचेगा ही क्या ? एक कहावत है – अगर धन गया मतलब कुछ नहीं गया, अगर स्वास्थ्य गया मतलब कुछ गया लेकिन अगर चरित्र गया तब सब गया । इसलिए चरित्र नहीं जाना चाहिए, वही हमारा मूल है ।
अब बात करते हैं समझदारी की । समझदारी की परिभाषा लोग अपने – अपने हिसाब से बनाते और फिर समय – समय पर बदलते रहते हैं । मेरे हिसाब से जिसकी रूह जिन्दा है, जो कुछ महसूस कर सकता है किसी घटना के घटने पर और जो विषम परिस्थिति से बिना किसी को नुकसान पहुँचाए खुद भी निकल सके और अपने साथ वाले को भी निकाल सके, वह समझदार है । समझदार इंसान का सवेंदनशील होना भी जरुरी है । सिर्फ अपने लिए ही सवेंदनशील नहीं, दूसरे के लिए भी, नहीं तो फिर वह स्वार्थ हो जायेगा । देखिये पहले अंतर समझते हैं :
- जो किसी भी हालत में अपना नुकसान न होने दे वह स्वार्थी है
- जो अपने फायदे के चक्कर में दूसरे के नुकसान की भी परवाह न करे वह धूर्त है
- जो अपने फायदे की तो सोचे लेकिन दूसरे का नुकसान भी न होने दे वह समझदार है
और जो सबके फायदे का सोचे उसपर फिर कभी लिखेंगें ।
कभी कभी हमें समझदार और आलसी में फर्क करना मुश्किल हो जाता है । आलसी के पास भी जबाब होते हैं किसी समझदार आदमी की ही तरह लेकिन अंतर यह है कि आलसी के पास जबाब कारण के रूप में होते हैं और समझदार के पास उपाय के रूप में । पर जबाब दोनों के पास रहते हैं । किसी काम को न करने के कारण और किसी काम को करने के उपाय, यही अंतर है दोनों में ।
समझदारी में एक सवेंदना है, एक उत्तरदायित्व का भाव है, एक ठहराव है । यह सुलहवादी सोच है पर चतुरता या चालाकी एक अलग चीज है । चतुरता हाजिर – जबाबी है, इसमें तत्क्षणिक का भाव है, इसमें स्थिरता नहीं है । इसे ऐसे समझे कि मुल्ला नसरुद्दीन चतुर थे और स्वामी विवेकानंद समझदार ।
खुद के स्तर पर, हक़ीक़त में, सबसे जयादा नुकसान समझदार ही उठाते हैं । क्यूंकि वह बहुत ऐसे लाभ के काम छोड़ देते हैं जिससे दूसरे किसी का नुकसान होने वाला होता है । मशहूर movie – द अवेंजर्स में, ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ा दुश्मन, थायनोस, आयरन मैन से कहता है – समझदारी एक श्राप है ! बहुत सारे लोगों का ऐसा मानना भी है पर मेरा मानना है कि अगर होने वाले नुकसान का अफ़सोस हो रहा है तो हम ऐसा कह सकते हैं कि समझदारी एक श्राप है । अपनी समझदारी से दूसरे की मदद करने से संतुष्टि मिलती है । हाँ, जब तक काम नहीं बना है तब तक चिंता हो सकती है पर अफ़सोस तो बिलकुल नहीं । अगर आपको अफ़सोस हो रहा है तो फिर आप अपने फायदे के बारे में ज्यादा सोच रहे हैं, और अगर ऐसा है तो आप अपनी कोटि बदलिए । आपकी सुविधा के लिए ही हमने ऊपर 3 कोटि बना रखा है ।
अब सवाल यह है कि कैसे प्राप्त करें समझदारी ?
तो भाई साहब, समझदारी प्राप्त करने के तीन तरीके हैं : शिक्षा, अनुभव और ध्यान । शिक्षा से रचनात्मकता आती है जो विषम परिस्थिति में बहुत काम आती है । किसी अनपढ़ आदमी की अपेक्षा आपके पास ज्यादा विकल्प होते हैं किसी विषम परिस्थिति से निकलने के लिए । यही मूल उद्देश्य है शिक्षा का – रचनात्मकता, न कि धन उपार्जन । धन उपार्जन के लिए शिक्षा जरुरी नहीं है, बिना शिक्षा के भी धीरू भाई बना जा सकता है । अनुभव आप दूसरे व्यक्ति को देख कर सीखते हैं । जितने सहयोगपूर्ण समाज में आप रहेंगें उतना ही आपका अनुभव बढ़ता जायेगा और जितने संकुचित समाज में रहेंगे उतना ही अनुभवहीन बने रहेंगें । कुछ लोग कहते हैं कि अनुभव खुद से भी हो सकता है जो कि बेबुनियाद बात है । अनुभव खुद से हो ही नहीं सकता । यह हमेशा किसी के मार्फ़त होगा । आप जिसे खुद से हुए अनुभव कहते हैं वह आपका तर्क है जिसके मूल में शिक्षा है । तर्क से आप घटनाओं को अपने दिमाग में जीते हैं और उससे मूल बात को निकाल कर उसे खुद से हुए अनुभव का नाम देते हैं । पर इसके लिए शिक्षा का होना जरुरी है जिसके बारे में हम पहले ही बात कर चुके हैं । इंसान के तर्क की एक सीमा है और जो सीमा के उस पार है उसे हम ध्यान से प्राप्त करते हैं । मैं हूँ, यह हमें पता है, पर मैं कौन हूँ यह जानना आध्यत्म है । ध्यान, आध्यात्म को पाने का जरिया है । इससे आप अपनी बहुत सारी, लगभग सारी समस्याओं, को ख़त्म कर सकते हैं । खैर इस मुद्दे फिर कभी बात करेंगें क्यूंकी इस विषय का क्षेत्र बहुत बड़ा और जटिल है । इसलिए सिर्फ परिचय देने से बात बनने से ज्यादा बिगड़ने का खतरा है ।
चलिए, फिर मुलाकात होगी !