कुछ दिन पहले अपने एक संबंधी के यहाँ एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने गया था । बहुत से लोगों से मिलना हुआ, बहुत दिन हो गए थे सबसे मिले हुये । मुझे यात्रा करना कभी भी रास नहीं आया । अब गाड़ी पर बैठ कर 3 – 4 घंटे तक गाड़ी के खिड़की से बाहर की तरफ देखना मुझे तो बहुत बोर करता है बाकी लोगों का पता नहीं । संबंधी कुछ नाराज से भी रहते हैं मेरी इस आदत की वजह से पर क्या कर सकते हैं हर इंसान की अपनी – अपनी पसंद और सोच होती है । मेरे संबंधी भी बस कहने को कह देते हैं बाकी उनको भी मालूम है कि (ऐसा मुझे महसूस होता है) मेरे मन में किसी के प्रति कोई मैल नहीं है बस मैं अपनी आदत से मजबूर हूँ ।
खैर, सबसे भेंट – मुलाक़ात हो रही थी तभी एक पहचान के आदमी मिले और हाल – चाल पुछने के बाद उन्होने कहा – क्या हो गया आपको ? आप तो पहले ज्यादा सुंदर और आकर्षक लगते थे । एक के बाद एक कई जबाब आये दिमाग में । लेकिन, आप हर जबाब हर किसी को नहीं दे सकते, छानना पड़ता है जबाब को सामने वाले के समझ के स्तर के हिसाब से । जब तक आपका जबाब सामने वाले आदमी के समझ मे नहीं आता है तब तक आपके उस जबाब का कोई मतलब नहीं है, वह अर्थहीन है । यही सामंजस्य बिठाना तो समझदारी हैं । मैंने खुद को संभालकर उनसे कहा कि – सब समय का खेल है । हमें मिले हुये सात साल से अधिक हो गए, लंबा समय होता है 7 साल, कुछ मेरा रूप गया और कुछ आपकी नजर । हंसने लगे और पूछ बैठे कि – आपके तरफ, सबको इतना फुड़ाता (हाजिर – जबाबी) है ? मैंने कहा कि – नहीं, ऐसा नहीं है, सबको लगभग बराबर ही फुड़ाता है, बस सबके पास शब्द नहीं होता अपनी विचारों को व्यक्त करने के लिए । मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि मुझे व्यक्तिगत तौर पर कोई शौक नहीं है अपने आप को अलग और विशेष दिखाने का । मैं यह मान कर चलता हूँ कि सभी इंसान के तर्क का स्तर एक ही होता है बस अंतर है कि उस तर्क को कौन कितना तराशता है । कोई खुद मेहनत कर अपने तर्क को तराशते हैं तो कोई जिंदगी और समय के भरोसे छोड़ देते हैं ।
बात निकल गयी थी । दोनों ही प्रश्न दीर्घ उत्तर वाले थे । मैंने कहा – अपनी भावनाओ और विचारों को व्यक्त करने के लिए शिक्षा जरूरी है । बिना शिक्षा के आप अपनी बातों को प्रभावी ढंग से नहीं रख सकते । अलग – अलग विषय के अपने अलग – अलग फायदे हैं –
साहित्य शब्द देती है अपनी विचारों को रखने के लिए और
विज्ञान अंधेरे मे चलने की ताकत देता है ।
हमें नहीं पता था कि बल्ब कैसे जलेगा ? एडिसन ने 1000 बार अंधेरे में तीर मारा, तब जाकर कहीं हमें वो तरकीब पता चली जिससे बल्ब से रौशनी उत्पन्न की जा सकी । हम अंधेरे में अपने तर्क के साथ चलते हैं तभी जाकर विज्ञान हमें कुछ सुविधा प्रदान करता है । विज्ञान मूल रूप से भविष्य की बात करता है या फिर उसकी जो हमें अभी तक पता नहीं पर उस चीज का अस्तित्व है । हमें बस उसको पाने का तरीका खोजना होता है ।
साहित्य आपके मन मे उठ रही हर विचारों और भावनाओ को वयक्त करने के लिए उचित शब्द मुहैया कराती है । वैसे तो कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अनपढ़ होते हुये भी बहुत हाजिर – जबाबी हैं पर मैं हाजिर – जबाबी के उस स्तर की बात नहीं कर रहा जो कुछ लोगों का मनोरंजन करने के लिए बोला जाता है । मैं उस हाजिर – जबाबी की बात कर रहा हूँ जो दूसरे लोगों को अपनी बातों से प्रभावित कर देते हैं । जिनकी बातों से ऐसा लगता है कि – कुछ ज्ञान मिला, कुछ पाया मैंने । ऐसा लगे जैसे मन यह कह रहा हो कि – ऐसी बातें मेरे दिमाग में क्यूँ नहीं आती । सही और सटीक शब्द का इस्तेमाल बिना शब्दों के ज्ञान के संभव नहीं और यह ज्ञान साहित्य ही दे सकती है फिर चाहे वह साहित्य घटित हो या काल्पनिक ।
अब पहले प्रश्न पर आते हैं – क्या सच में एक समय के बाद इंसान का रूप (खूबसूरती) चला जाता है ? एक तरह से देखें तो हम कह सकते हैं कि रूप जाता तो है पर वही रूप जाता है जिस रूप को हम देखने के आदि हो चुके होते हैं । एक रूप जाता है ताकि एक नया रूप आ सके । चुकी हमनें इससे पहले इस नए रूप को देखा नहीं था इसलिए हम कहते है कि अमुख इंसान का रूप चला गया, मतलब कि उसका पुराना वाला रूप चला गया । हर रूप की अपनी अलग खूबसूरती है । बचपन कोमलता और नादानी से भरा होता है, जवानी की पहचान : ताकत, ताजगी और जोश है, प्रौढ़ अवस्था में इंसान अपने विचारों और अपने कर्मों के दृष्टिकोण से सुडौल, संगठित और ठोस नजर आता है वहीं वृद्ध अवस्था मे पूरा शरीर चीख – चीख कर अपनी लाचारी और मजबूरी बताता है पर चेहरे पर अनुभव की झुरियाँ यह बोलती रहती हैं कि – हमने दुनियाँ देख रखी है ।
अब अगर कोई इंसान प्रौढ़ अवस्था में है और आप के जेहन में उसके बचपन की तस्वीर है और आप दोनों का मिलान कर रहे हैं तो यह गलती आपकी है । आप यह देखिये की वह इंसान प्रौढ़ अवस्था के सारे मापदण्डों को पूरा कर रहा है या नहीं ? आपको हमेशा यह देखने की कोशिश करनी चाहिए कि इंसान अपने – आप के पैमाने में कहाँ तक पहुंचा है, न की हमारे – आपके पैमाने में वह कहाँ तक पहुंचा है । वह अपने लक्ष्य से कितनी दूरी पर है, अगर वह करीब है तो हम कह सकते हैं कि वह इंसान सफल है, सुंदर है । सुंदर का मतलब है कि हर चीज अपने सही जगह पर सही ढंग से उचित अनुपात में रखी हुयी हो । english मे एक movie देखी थी, movie का नाम तो सही से याद नहीं आ रहा, शायद movie का नाम था – next, लेकिन कलाकार थे Nicolas Cage और Jessica Biel । इस movie के एक दृश्य मे Jessica को देखकर Cage कहते हैं – जहां जो चीज जितनी होनी चाहिए अगर उतनी ही हो तो उसे सुंदर कहते हैं और तुम सुंदर हो । सुंदरता का रंग या चेहरे की झुरियों से कोई लेना देना नहीं है । यह सब मनगढ़ंत और बेतुकी बातें हैं । पहली नजर में जो आकर्षित करता है वो किसी के चेहरे का भाव है ना की चेहरे की सुन्दरता, गौर कीजयेगा इस बात पर । पर चेहरे की सुन्दरता और चेहरे के भाव से आप बार – बार किसी को अपनी तरफ नहीं खींच सकते, इसके लिए आपको बोलने की शैली और शब्दों का सटीक चयन करना आना चाहिए । इसलिए जरूरी तो दोनों है – खूबसूरती और वाकपटुता ।
उन्होंने कहा कि – मुझे लगता है आप प्रौढ़ हो चुके हैं । मेरे जबाब फिर से तैयार था, मैंने कहा कि – शादी के साल में साढ़े सात जोड़ दे तो हर कोई प्रौढ़ ही होता है ।
चलिए, फिर मुलाकात होगी !