कई बार मन में यह विचार आता है कि अपनी जीवनी लिखूँ और मन में ऐसे विचार आने के कारण हैं । कारण हैं हमारे कुछ मित्र, जिनका मानना है कि कुछ तो अलग है तुम्हारी ज़िंदगी में, थोड़ी ज्यादा पेचीदगी है, सामान्य कार्य में भी जटिलता है, कुछ न कुछ मुसीबत आती ही रहती है । खैर इसपे ज्यादा नहीं लिखुंगा, मामला personal हो जाएगा, इतना तो बस starter के लिए लिखा था ।
जो भी इंसान अपनी जीवनी लिखते हैं या किसी और से लिखवाते हैं : उनके मन में भी ऐसे ही कुछ विचार आते होंगें, उन्हें अपनी ज़िंदगी कुछ तो विशिष्ट लगी ही होगी औरों की तुलना में, कुछ तो अलग लगा ही होगा, अपने को खास महसूस किया होगा, जरूर किया होगा । जीवनी लिखने का मूल तत्व या मकसद ही यह है कि : यह कहानी, जो हमने जिया है, कहनी जरूरी है क्यूंकी किसी और ने शायद ही जिया हो ! मेरे अनुभव से बाकी लोग सीख ले – ऐसा जीवनी के कर्ता की इच्छा या सोच रहती है । सार यह हुआ कि जीवनी लिखने या लिखवाने वाले को अपनी ज़िंदगी विशिष्ट लगती है, बाकियों की तुलना में । मुझे लगता है कि ऐसा सोचना कुएं के मेढक की सोच वाली बात है । हमनें बाकी लोगों के संघर्ष को देखे बिना ही अपने संघर्ष को विशिष्ट बता दिया । अगर आपके पास शब्द है या पैसा है तो आप अपनी जीवनी लिख या लिखवा सकते हैं, दोनों है तो फिर देर किस बात की है ? आज – कल तो जमाना ही marketing का है, हर चीज बिकती है बस packing अच्छे से करना होता है । अंदर तत्व कितना दृढ़ और मजबूत है, कितना संकल्पित है, कितना असली है, अपने मूल गुण से कितना कम भटका हुआ है ? यह सब बातें देखता कौन है ? हाँ ! लेकिन बाहरी आवरण सुंदर और मजबूत होना चाहिए ।
असलियत में हर किसी को अपनी ज़िंदगी विशिष्ट लगती है लेकिन या तो शब्दों की कमी है कि खुद लिख नहीं पाते या फिर पैसे की कमी है कि दूसरे से लिखवा नहीं पाते । यही कारण है कि सबकी कहानियाँ सबके पास पहुँच नहीं पाती लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि उनकी ज़िंदगी के अनुभव विशिष्ट नहीं थे ।
लोग अपने जीवन के अनुभवों को अलग – अलग तरीके से प्रदर्शित करते हैं । मुख्य रूप से इसे प्रदर्शित करने के 3 तरीके हैं :
- एक तो वह लोग जो अपने अनुभवों का घमंड करते हैं और अनुभवों का धौंस दिखाकर सामने वाले से अपनी बात मनवाने का प्रयास करते हैं ।
- दूसरे वह लोग जो अपने संघर्ष के दिनों के अनुभवों का महिमामंडन कर लोगों से सहानुभूति या मदद की अपेक्षा करते हैं ।
- तीसरे वह लोग जो बिलकुल तथष्ट रहकर अपनी कहानी को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करते हैं और सामने वाले पर छोड़ देते हैं कि वह उस कहानी को किस रूप में लेता है ।
सबसे पहले उनलोगों की बात करते हैं जो अपने अनुभव पर घमंड करते हैं । ऐसे लोग दूसरे के विचारों को जगह नहीं देते हैं । ये चाहते हैं कि इनकी बात सब सुनें और माने क्यूंकी ये जो बता रहे हैं वह इनके खुद का अनुभव किया हुआ है और स्वप्रमाणित है । इसमें शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है । ऐसे लोग अक्सर मूर्खों के बीच में बैठना पसंद करते हैं क्यूंकी वहाँ उन्हें प्रतिरोध नहीं मिलता, हालांकि ये मानते नहीं इस बात को । इन्हें लगता है कि इनकी बात का कोई जबाब ही नहीं है क्यूंकी सबसे उत्तम विचार तो इनका ही है । अपने ही अनुभवों के मद में चूर रहते हैं और अपने विचारों की एक लकीर बना लेते हैं । उस लकीर पे चलना ही उनका लक्ष्य है । हक़ीक़त में ये भी लकीर के फकीर ही हैं बस फर्क इतना है कि लकीर इनकी खुद की खिचीं हुयी है । ऐसे लोगों की संख्या सबसे अधिक है और बड़ी आसानी से आपको अपने आस – पास मिल जाएगें । मेरा मानना है कि जब तक आप दूसरे विचारों को आने नहीं देगें और दोनों विचारों को नाप – तौल करके नहीं देखेगें तब तक इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा जा सकता हैं कि आपका विचार ही सर्वोत्तम है ।
दूसरे तरह के लोग वे होते हैं जो अपने संघर्ष के दिनों का घमंड नहीं करते लेकिन सहानुभूति या मदद की इच्छा रखते हैं । ऐसे लोग बड़ी आसानी से आपको TV पर मिल जाएगें, आज – कल जीतने भी reality shows होते हैं उनपर । मुझे समझ नहीं आता है कि ये लोग इतने कमजोर कैसे हो जाते हैं ? भला जिसने संघर्ष किया हो वह इतना कमजोर कैसे हो सकता है ? निश्चित रूप से यह बनावटी है और अगर बनावटी है तो फिर इसका मतलब है कि संघर्ष मर चुका है या फिर संघर्ष कभी था ही नहीं । संघर्ष की कोई कीमत नहीं होती, संघर्ष अपना मूल्य लेके खुद आता है लेकिन अगर आप अपने संघर्षों की गाथा लोगों को सहानुभूति या किसी भी प्रकार की मदद की इच्छा से सुनाते हैं तो इसका मतलब हुआ कि आपको अपने किए हुये संघर्षों का मूल्य चाहिए और अगर ऐसा है तो यह निहायत ही घटिया और नीच हरकत है । आप उस संघर्ष के लायक ही नहीं थे जो प्रकृति ने आपको सौपें थे । संघर्ष का मतलब दुख या कष्ट नहीं होता, ये तो एक मौका है जो प्रकृति मजबूत कंधों को और मजबूत और जिम्मेदार बनाने के लिए देती है । आप उस मौके का फायदा उठा रहे हैं अपने आपको शोषित दिखाकर । इसका मतलब है कि असलियत में आप धूर्त हैं ।
तीसरे तरह के लोग वे हैं जो बिलकुल तथष्ट रहकर अपनी कहानी को ज्यों का त्यों सामने वाले को सुनाते हैं और सामने वाला उस कहानी या संघर्ष से निकले अनुभवों को किस तरह और कितना आत्मसात करता है ये सामने वाले पर छोड़ देते हैं । मुझे लगता है कि यह सबसे बेहतर तरीका है अनुभवों को साझा करने का । सुखपूर्वक और खुशीपूर्वक जीने का सबसे बढ़िया और सरल उपाय है कि किसी से कोई उम्मीद ही नहीं रखिए और वैसे भी अगर दूसरे के अनुभव से सीख लेकर लोग अमल कर रहे होते तो लोग गलती करते ही नहीं । असलियत में लोग तभी सीखते हैं जब उन्हें ठोकर लगती है ।
मेरा मानना है कि अनुभव खुद के लिए होता है, दूसरों के लिए नहीं । लोग अपने अनुभव से दूसरे को सीख देने में लग जाते हैं । हर इंसान की जीवनशैली और कार्यपद्धति अलग होती है । आपका अनुभव हो सकता है कि किसी और के किसी काम का ना हो । जरूरी नहीं कि किसी सफल आदमी के कार्यपद्धति को अपना लें तो आप भी सफल हो जाएगें, बिलकुल जरूरी नहीं है । सफलता के लिए सिर्फ कार्यपद्धति का ही सही होना जरूरी नहीं है, और भी बहुत सारे कारण हैं जो बहुत जरूरी हैं । आपसे जुड़ी हर छोटी से छोटी बात आपको सफल या असफल बनाने में अहम भागीदार होती है ।
चलिए, फिर मुलाकात होगी !