हम सभी अपने माता-पिता से बहुत प्यार करते हैं, करना भी चाहिए, आखिर उन्हीं की वजह से तो हम अस्तित्व में आए हैं और कुछ भी कर सकने की स्थिति में आये हैं । अब सवाल यह है कि कितना करना चाहिए ? मतलब कोई तो सीमा – सरहद होगी, आखिर हर चीज की एक सीमा है । हमारे समाज में तो कहा भी गया है – अति सर्वत्र वर्जयेत, मतलब, अति सभी जगह वर्जित है । मैं पहले ही साफ कर दूँ कि बनियागिरी करना मेरा उद्देश्य बिलकुल नहीं है, इस मुद्दे पर । मेरा उद्देश्य बस अति को कम करना है, अगर अति है तो । चलिए फिर से सवाल पे लौटते हैं, हाँ तो, कितना करना चाहिए ?
जितना प्यार माता – पिता अपने बच्चों से करते हैं, क्या उतना ही बच्चों को भी अपने माता – पिता से करना चाहिए ? नहीं, मेरे विचार से उतने की जरुरत नहीं है । जितना वह बच्चा किसी भी दूसरे सर्वगुण संपन्न इंसान से करता है या उसे मानता है, उतना ही बस । बाकि वो भविष्य में आने वाले अपने बच्चों के लिए बचा कर रखे अपना प्यार, आखिर वो भी तो कभी माता – पिता बनेगा ही, क्यूंकि, अगर आप किसी के मार्फ़त आये हैं तो किसी को लाने में आप भी मार्फ़त बनियेगा, यही तो कर्तव्य का स्थानांतरण है । ये तो चलते ही रहना चाहिए, यही नियम भी है । बस, बात ख़त्म । ये है जबाब और ये है बटवांरा । बराबर का बटवांरा । और हाँ, ये बार – बार मुझे माता – पिता लिखना अच्छा नहीं लग रहा है, लंबा हो जा रहा है, संयुक्त शब्द है न, सो अभी से आगे इस लेख में, मैं उन दोनों को जोड़ी लिखूंगा, मतलब जहाँ जोड़ी लिखा दिखे, आप समझ लेना कि मैं माता – पिता लिखना चाह रहा हूँ । एक और बात, अपने माता – पिता के प्रति प्यार दिखाने के चक्कर में बहुत ज्यादा विनम्र बनने की या दिखने की भी जरुरत नहीं है । अगर आप मूल स्वभाव से विनम्र है तो फिर कोई बात नहीं, लेकिन अगर आप विनम्र बनने की या दिखने की कोशिश कर रहे हैं तो न करें, व्यर्थ जायेगा, ये बनावटी होगा, काम नहीं करेगा । यहाँ कर भी जाये तो वहां काम नहीं करेगा जहाँ इस सब का हिसाब होता है । आख़िरकार, आपका मूल तो आपके अलावा आपके माता – पिता के पास भी है, इसलिए उनके सामने नाटकीयता की जरुरत नहीं है, बहुत हल्का लगेगा, मतलब बहुत ही हल्का, बहुत ओछा । अब यह समझते हैं कि कारण क्या है इस जबाब का ?
देखिये ऐसा है कि – किसी न किसी के मार्फ़त से तो हमें जन्म लेना ही था, क्यूंकि हम लाइन में थे । अब यह संयोग ही था न कि उनके मार्फ़त से हम यहाँ आये जिन्हें हम आजकल माता-पिता कहते हैं । उन्होंने तो कोई तपस्या नहीं की थी या भगवान के सामने धरना या भूख – हड़ताल तो नहीं किया था कि हमें यही बच्चा चाहिए, वर्ना हम यहाँ से नहीं जायेंगें । यही नाक – नक्स वाला चाहिए, यही गुण वाला चाहिए । भाई साहब, वो तो लाटरी थी, किसी न किसी की लगती, आप की लग गयी उस जोड़ी के साथ । कहीं न कहीं तो आप जाते ही, इस जोड़ी के घर आ गए । इसमें उनका कोई योगदान नहीं है, यह बस एक लॉटरी था, एक जुआ था । हाँ, इस जुए में कुछ न कुछ फंसता जरूर है, कोई जोड़ी खाली हाथ नहीं जाता । एक और अंतर है बाकि लॉटरी से इस लॉटरी में । इस लॉटरी में खुद लॉटरी भी मुनाफा कमा सकता है या फिर घाटा सहना पड़ सकता है । Risk सिर्फ लॉटरी जितने वाले को ही नहीं है कि : IIT तोड़ेगा कि ITI भी देख नहीं पायेगा, बल्कि खतरा खुद लॉटरी पर भी है कि : किसके हाथ लगे हैं, नरेगा वाले के हाथ या अंबानी – अडानी के । खैर एक बार जब लॉटरी हाथ में आ गयी तो उसको भजाना तो था ही, मतलब, जब आ गए हो आप उस जोड़ी के घर तो उनको पालना तो था ही, जो आता उसी को पालते, आप आये तो आपको ही पालेंगे न । वह बस अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, आप भी कीजिएगा जब आपकी बारी आएगी, मतलब जब आप माता – पिता बनेगें । अब बात आती है सम्मान करने की या इज्जत करने की, तो कितनी ?
जबाब है – बाकि सबसे थोड़ा ज्यादा । ज्यादा इसलिए कि चाहे जैसी भी स्थिति हो, इस धरती पर तो आप आये हैं उनके ही मार्फ़त । ये गुण तो धरती पर और कोई इंसान आपके लिए नहीं रखता और दूसरी बात आप अपने होने वाले बच्चों से प्यार करेंगें, उनकी इज्जत नहीं करनी है । तो वो हिस्सा भी आप इस जोड़ी को दे सकते हैं, इसलिए थोड़ा ज्यादा । अब यहाँ कुछ पिनपिनाये लोगों को लगेगा कि यह क्या बोल रहा है ? क्या अपने बच्चों की हमें इज्जत नहीं करनी चाहिए ? तो भाई साहब, आप समझे नहीं । इज्जत एक ऐसा शब्द है जिसमें धाख है, थोड़ा डर भी है, एक हिचक है, बहुत सारा विश्वास और एक मर्यादा है । बच्चों को इन सब चीजों कि जरुरत नहीं है, उन्हें बस लाड – प्यार की जरुरत है, ख्याल रखने की जरुरत है । अब सवाल यह है की इतना सब लिखने की जरुरत क्या थी ?
कुछ कलम के लंगड़े सिपाहियों ने माँ – बाप का एक माहौल बना रखा है । उन्हें बहुत ऊपर बिठा रखा है, भगवान के बराबर में । जबकि उन्हें हमारे साथ होना चाहिए, बिलकुल अपने बगल में । भगवान की तरह नहीं जो हमारी पहुँच में ही नहीं हैं । लिखने वालों ने माहौल गरम कर के रखा है, शायद लॉटरी हार गया होगा ! वरना इतने महिमामंडन की जरुरत क्या थी ? यही महिमामंडन कुछ जोड़ी के सर चढ़ जाता है और वो ऐसा जताने लगते हैं जैसे कोई एहसान कर रहे हैं अपने बच्चों को पाल कर । अरे किसने कहा था कि – जन्म दो । तुमने जन्म दिया तो पलना तो पड़ेगा ही । इसमें एहसान कैसा ? यह तो आपका फर्ज है, आप अपना फर्ज पूरा कीजिए, बच्चे अपना करेंगें जब उनका समय आएगा । मतलब, जब वो किसी को धरती पर लाने का कारण बनेगें, बस, बात खत्म । अगर बच्चा नालायक निकला तो इसमें बच्चे की कोई गलती नहीं है, आप ने परवरिश ढंग से नहीं की, मतलब आपकी भाषा में कहें तो आपने ढंग से निवेश नहीं किया और आपका धंधा विफल हो गया । सबका तो विफल नहीं हुआ, कुछ लोगों का निवेश तो बहुत अच्छा मुनाफा दे रहा है । अगर कोई धंधा विफल हो जाये तो गलती धंधे की नहीं है बल्कि गलती है निवेश करने वाले की । धंधा तो सपाट हैं, सीधा हैं, सरल है, इतना सरल कि निर्जीव भी कह दो तो कोई गलत नहीं होगा । मैं बार – बार परवरिश को धंधे से इसलिए जोड़ रहा हूँ क्यूंकि आजकल के माता – पिता की मानसिकता ऐसी हो गयी है । वो बच्चे को इसलिए शिक्षा दिलवाते हैं ताकि बड़ा होकर वो कुछ पैसे कमा कर देगा । बचपन भी नहीं जीने देते ढंग से । अरे अच्छे संस्कार दो, अपने चरित्र का उदहारण पेश करो । जैसा आप उसे बनाना चाहते हो वैसा खुद बन जाओ । कहने से नहीं मानते हैं बच्चे, देख कर सीखते हैं, अपने आस – पास के लोगों को देख कर । पहले खुद अच्छे बनो फिर परिवेश अच्छा दो और फिर देखो मुनाफा कैसे नहीं होता है, होना ही है, बिलकुल होगा । नहीं – नहीं, इनका ऐसा है कि खुद तो करेंगें कुटान – पिसान लेकिन संतान चाहिए इनको दुर्गादत्त पहलवान ।
अब निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, देखिये, माता और पिता को महिमामंडित किया गया है, जिसकी जरुरत नहीं है । सामान्य सम्बन्ध रखे, कोई नाटकीयता नहीं रखें, जो हो, साफ़ हो, स्पष्ट हो और विशवस्नीय हो । नजदीक रहें, भगवान कि तरह दूर नहीं ताकि हैं भी कि नहीं, ये भरम ही रहे ।
चलिए, फिर मुलाकात होगी !