बचपन में जब उपन्यास पढ़ता था तब एक लाइन अक्सर सामने से गुजरती थी – शून्य में देखती आँखें। थोड़ा – थोड़ा अब समझ में आ रहा है कि वो आँखें कहाँ देख रही थी। आप कभी गौर कीजिएगा – शून्य की तरफ देखती आँखें ही अपने पूर्ण रूप में होती हैं: ना कोई आशा, ना निराशा, ना ही इच्छा, ना कोई आकांक्षा ! कुछ – कुछ वैसा ही जैसा बदन तोड़ती थकान के बाद जब हम अपने शरीर को गद्देदार बिछावन के हवाले कर निढाल हो जाते हैं, तब जो शरीर की स्थिति होती है – जैसे उसे वह सब मिल गया जो उसे चाहिए था।
ठीक से याद नहीं, शायद आठवीं या नौवीं में पहली बार बिन्दु के बारे में पढ़ा था। पढ़ा क्या था – याद किया था कि – जिसमें लंबाई, चौड़ाई और मोटाई ना हो उसे ज्यामितीय भाषा में बिन्दु कहते हैं। मुझे लगभग 20 साल के बाद यह बिन्दु समझ में आया, थोड़ा – बहुत, जब अपने ही एक छात्र को पढ़ा रहा था। किताब में तो हर बात लिखी रहती है पर पढ़ना और आत्मसात करना दोनों अलग बातें हैं। उस दिन शायद आत्मसात हुआ। ऐसा लगा जैसे – अरे ! यह तो कुछ और ही कह रहा था !
सबसे पहली बात तो यह कि – हम बिन्दु को कागज पर बनाते नहीं हैं जैसे रेखा, त्रिभुज या अन्य किसी ज्यामितीय आकृति को बनाते हैं। बिन्दु तो खुद ही बनता है जब – जब कलम और कागज में स्पर्श होता है। दरअसल, बिन्दु को आप बना ही नहीं सकते। हम ऐसा कुछ भी नहीं बना सकते जिसमें न तो लंबाई हो, न चौड़ाई और न मोटाई। हाँ, मान्यता है तो हम भी मान लेते हैं। मजबूरी है, बिना माने गणित और विज्ञान तो लँगड़े घोड़े की तरह है। यह दोनों पहले मानते हैं फिर उसी माने हुये को साबित करते हैं और हमसे कहते हैं कि – देखो, हमनें जो माना था वह सही था। क्या विडम्बना है ! मुझे लगता है – मार्केटिंग की शुरुआत यहीं से हुयी होगी। जरूर, इन्हीं दोनों विषय के विशेषज्ञों ने मार्केटिंग की अवधारणा को बाजार में लाया होगा।
खैर छोड़िए, मुद्दे पर आते हैं:
ज्यामितीय परिभाषा के अनुसार जिसमें लंबाई तो हो पर चौड़ाई और मोटाई न हो उसे रेखा कहते हैं। अगर रेखा को अगर हम लंबाई में कम करते चले जायें तो एक ऐसा समय आएगा जब लंबाई इतनी रह जाएगी जिसको हम माप नहीं सकते और अगर माप नहीं सकते तो फिर उसको और छोटा या कम भी नहीं कर सकते। पर अगर हमारे पास उस “कम से कम” लंबाई को भी मापने का कोई यंत्र हो तो क्या उस रेखा की लंबाई को हम और भी कम कर सकते हैं ? नि:संदेह कर सकते हैं ! गणित के छात्र इसे बड़ी आसानी से समझ सकते हैं। निष्कर्ष यह निकला कि उस रेखा को चाहे हम कितना भी लंबाई में कम कर दे, हमेशा उसकी कुछ न कुछ लंबाई तो रहेगी ही, भले ही हम उसे माप न पायें। इसी को नगण्यता की स्थिति कहते हैं और नगण्य का मतलब “कुछ नहीं” नहीं होता है। नगण्य का मतलब – इतना कम, जिसे हम माप नहीं सकते। नगण्यता के अस्तित्व को हम झुठला नहीं सकते। वह है पर हमारी मापने की क्षमताओं से परे।
बिलकुल इसी अवधारणा का उपयोग कर हम ब्रम्हांड के विस्तार को भी समझ सकते हैं। जैसे रेखा – बिन्दु के अवधारणा को समझने के लिए हम अधिकतम से न्यूनतम की तरफ जाते हैं वैसे ही ब्रम्हांड के विस्तार को समझने के लिए हमें न्यूनतम से अधिकतम की तरफ जाना चाहिए। जितना अधिक हम ब्रम्हांड के विस्तार को देखते – समझते जाते हैं यह उतना ही बड़ा प्रतीत होता जाता है। इसके अंत पर हम पहुँच ही नहीं पाते हैं, इसे माप ही नहीं पाते, इसके विस्तार के बारे में कोई अनुमान लगा ही नहीं पाते। जिस तरह रेखा – बिंदु के मामले में हम न्यूनतम को प्राप्त नहीं कर पाते हैं उसी तरह ब्रम्हांड के विस्तार के मामले में हम अधिकतम को प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
अब थोड़ा शून्य (zero) पर बात करते हैं। क्या शून्य का मतलब “कुछ नहीं” होता है ? नहीं ऐसा नहीं है ! शून्य के बारे में हम सटीकता से कुछ नहीं कह सकते क्यूंकि शून्य का मान निर्भर करता है शून्य की स्थिति पर। अगर किसी संख्या के आगे आये तो सबसे मूल्यवान पर अगर पीछे आये तो अर्थहीन, कोई मूल्य नहीं ! अगर किसी भी परिस्थिति में शून्य का कुछ मान है तो फिर हम इसे झुठला नहीं सकते। मूल्य तो है शून्य का, पर कितना ? पक्के तौर पर यह कहना अभी तक संभव नहीं हो पाया है जैसा हम बाकी के 1 से 9 तक की संख्याओं के बारे में बड़ी दृढ़ता से कहते आये हैं। संभव होगा भी नहीं कभी, आखिरकार “आदि” जो है।
अँग्रेजी में एक कहावत है – nothing is perfect. इसका मतलब कि “पूर्ण” जैसा कुछ नहीं होता। मैं नहीं मानता ! मेरा मानना है कि बिना पूर्णता के तो कुछ संभव ही नहीं है। अगर कुछ है तो उसका आदि और अंत दोनों ही होगा। ठीक उसी तरह जैसे किसी धागा में दो सिरा होता है – एक जहाँ वह शुरू होता है और एक जहाँ वह खत्म होता है। कितना भी बड़ा या कितना भी छोटा धागा हम ले लें, उसके दो सिरे तो होंगें ही। बस बात इतनी सी है कि न्यूनतम और अधिकतम की स्थिति में उसे हम सही – सही माप नहीं सकते। हमारी क्षमता का सवाल है, सीमित है हमारी क्षमता ! हम 20 Hz से 20000 Hz तक की ध्वनि को ही सुन सकते हैं, तो क्या इस सीमा के बाहर की कोई ध्वनि नहीं ? बिलकुल है ! पर हमारी क्षमता नहीं है कि उसे सुन सकें। निष्कर्ष यह है कि – अगर किसी चीज को हम माप नहीं पायें तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि उस चीज का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
ना तो हम शून्यता को समझ या प्राप्त कर पाते हैं और न ही पूर्णता को। हम प्राप्त नहीं कर पाते हैं क्यूंकि हम दोनों को अलग – अलग कर के देखते हैं। आप उस धागे के दोनों सिरों को आपस में जोड़ दीजिये ! सब कुछ प्राप्त हो गया। शून्यता ही पूर्णता है।
चलिये, फिर मुलाक़ात होगी !