अगर कोई आपसे यह कहे कि आज सोमवार है और कलेंडर भी यही बोल रहा हो की आज सोमवार है तो क्या आप इस तथ्य को सत्य मान लेंगें ? आप मान लेंगें ! आप भी कहेंगें कि – हाँ, आज सोमवार है । लेकिन ये सत्य नहीं है, ये सापेक्ष सत्य है, पूर्ण नहीं ।
अगर दिन का नाम रखने वाले ने रविवार के बाद आने वाले दिन का नाम बुधवार रखा होता तो आज के दिन को आप बुधवार कहते, ना कि सोमवार । मतलब, आपका सत्य निर्भर करता है किसी के परिकल्पना पर ! इस तरह के कई उदाहरण दिये जा सकते हैं । कहने का मतलब है कि – हम बोलचाल मे प्रयोग किए गए अपने शब्दों को सत्य मानते हैं जबकि सत्य केवल उन शब्दों के भाव होते हैं, शब्द सत्य नहीं होते, हो ही नहीं सकते, क्यूंकी वो गढ़े गए हैं । भाव गढ़े नहीं जाते, वो प्राकृतिक होते हैं, जैसे समय प्राकृतिक है, समय को हम गढ़ नहीं सकते, इसलिए समय सत्य है, पूर्ण सत्य ।
हमने पहले ये माना कि – अमुख वजन को हम 1 kg कहेंगें और फिर इस 1 kg से तुलना करके हम ये पता लगाते हैं कि कोई वस्तु 5 kg वजन की है या 10 kg वजन की । ये सब हमारा मानना है । अगर हमने अपने पैमाने को थोड़ा और बड़ा माना होता तो आज जिसे हम 5 kg मानते हैं उसे 3 kg ही मानते । मतलब कि – हमारा आज का सत्य इस बात पर निर्भर करता है कि हमने शुरूआत में माना क्या था या शुरुआत में हमने कितने वजन को अपना पैमाना माना था ? अब आप ही बताइये, ये कैसा सत्य हुआ जो खुद स्थिर नहीं है । यही बात आइन्सटाइन भी समझा चुके हैं अपने Theory of Relativity में । आइन्सटाइन का कहना था कि हम स्थिर तो हैं मगर तब जब कोई हमें पृथ्वी से देखें, तब नहीं जब कोई हमें अंतरिक्ष से देखें । अंतरिक्ष से कोई अगर हमें देखे तो उसे हम घूमते हुये नजर आएंगें । निष्कर्ष ये है कि – अगर reference बदल दिया जाए तो result बदल जाएगा । पूर्ण सत्य वही है जो reference के बदलने से भी ना बदले, मतलब जो हर परिस्थिति मे नियत रहे ।
हम हैं, ये सत्य है, लेकिन मेरा नाम राजू है, ये सत्य नहीं है । नाम तो कुछ भी हो सकता था । अगर मेरी माँ ने मेरा नाम मोहन रखा होता तो लोग आज मुझे मोहन नाम से पुकारते, पर उससे क्या मैं बदल जाता ? क्या मेरा स्वभाव बदल जाता ? नहीं ! शेक्सपियर ने भी तो यही कहा है – नाम में क्या रखा है ! नाम बस एक reference है मुझे संबोधित करने का । मेरे नाम से मेरे बारे में कोई भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता । मेरे बारे मे जानने के लिए किसी को मुझसे मिलना पड़ेगा, मुझसे बात करनी होगी, मेरे विचार जानने होंगे । अभी हाल के सालों मे ही एक movie आयी थी – आँखों देखी । कमाल की movie है । इन्हीं सब मुद्दों पर केन्द्रित भी है । जरूर देखिये, अगर मौका मिले तो ।
अब सवाल यह है कि क्या – बिना reference के समाज मे रहा जा सकता है ? जबाब है – मुश्किल है । हाँ, अगर आप जंगल में रहते हैं या अकेले रहते हैं तो यह संभव हो सकता है मगर जब भी आप किसी से बात करेंगे तो आपको reference की जरूरत पड़ेगी । आप खुद ही सोच कर देखिये कि अगर कोई आप से पुछे कि आज कौन सा दिन है ? या अमुख वस्तु का वजन क्या है ? या आपका नाम क्या है ? तो आप क्या जबाब देंगे ? आज दिन तो है, कोई न कोई, यह तो सत्य है । इसी तरह अमुख वस्तु का कुछ न कुछ वजन तो है और अंतिम प्रश्न के जबाब में आपका वजूद है । ये सभी सत्य तो है पर इस सत्य को बताने के लिए reference की जरूरत पड़ेगी । हाँ, अगर बताने की जरूरत न हो तो आप पूर्ण सत्य को पकड़ कर रह सकते हैं और ऐसा तभी होगा जब आप अकेले रहते हो या फिर जंगल मे रहते हो । समाज में संभव नहीं है पूर्ण सत्य के साथ रहना । हम यह कह सकते हैं कि सत्य अपने मूल रूप में रह तो सकता है पर अगर उसे बाहर निकलना है तो फिर ऐसा हो सकता है कि उसे reference या झूठ का सहारा लेना पड़े । सत्य का अपना कोई चेहरा नहीं होता, वो अनगढ़ है । उसे बाहर निकलने से पहले झूठ का चेहरा लगाना पड़ता है । क्या विडम्बना है !
अब इसी सवाल के दूसरे पहलू पे चलते हैं – अगर इतनी समस्या है तो फिर ऐसे सत्य को छोड़ नहीं सकते ? क्या सत्य को साथ लेकर चलना जरूरी है ? जहां तक मेरा मानना है, सत्य बहुत ही निर्दयी और क्रूर होता है, इसमे भाव नहीं होता है । सत्य जैसा है वैसा ही रहेगा, आप पे दया नहीं दिखाएगा वो । मान लिजये कि कोई इंसान अपने परिवार का पेट भरने के लिए चोरी करता है, आखिर में जब उसके पास कोई और उपाय बाकी नहीं रहता । यहाँ सत्य उसके विरोध मे खड़ा रहेगा और उसे सजा दिलाने के लिए तत्पर रहेगा बिना यह देखे कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि उस इंसान को चोरी करनी पड़ी । ऐसे सत्य को लेके क्या करना जिसमें कोई भाव ही न हो । इसलिए इसे छोड़ने में कोई बुराई नहीं, मेरे हिसाब से । हाँ, अगर आपको मानना ही है तो मानिए, केवल theory के लिए । वास्तविक जीवन में आपको व्यवहारिक होना चाहिए, ऐसा जो किसी घटना के होने पर उसका कारण भी देखे और मूल्यांकन के समय कारण को भी ध्यान में रखे । उस सत्य की तरह नहीं जो बिना कारण को देखे बस घटना के आधार पर ही अपना फैसला सुनता है ।
जीवन से बड़ी अनमोल चीज कोई और नहीं । मान लिजये कि कोई इंसान अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है और अब कभी भी वो इस दुनियाँ से विदा हो सकता है । उसका एक लड़का है जो विदेश मे कहीं रहता है । उस बूढ़े इंसान की आखिरी इच्छा है कि एक बार, अंतिम बार, वो अपने बेटे को देख ले । उसका लड़का ये खबर सुनते ही अपने घर के लिए निकल पड़ता है पर होनी तो तय रहती है पहले से ही । रास्ते मे ही उसका जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है और उस लड़के की मृत्यु हो जाती है । अब आप ये बताइये कि उस बूढ़े मरणासन्न इंसान से क्या बोला जाए ? सच बता देना चाहिए ताकि वह जो 2 दिन और जी सकता था वो अभी के अभी मर जाए या झूठ ही सही कोई बहाना बनाकर बोल दिया जाय ताकि वह अपनी उम्र पूरी करे। क्या किया जाए ? सोच के देखिये । मुझे लगता है कि झूठ मे थोड़ी व्यवहारिकता है, जबकि सत्य कठोर है, निर्मम है, असंवेन्दंशील है ।
चलिए, फिर मुलाकात होगी !